‘अपने देश से बिछड़ के हम दूर कहाँ तक जायेंगे,
अपनी धरती की बात अलग हम लौट के वापस आयेंगे’
हवा के झोंके में उड़कर, मेरे देश की मिटटी आई है,
तुम आये तो घर की याद आई है,
तुम आये तो मुझे मेरे घर की याद आई है
वो गाँव गलियां सारी, वो खेत और फुलवारी,
वो आम के पेड़ का झूला, वो झोपड़ी मेरी प्यारी,
जब बिछड़ गए थे हम, तो हुआ था हमको भी गम,
आज पुरानी वही कहानी वक़्त ने दोहराई है
तुम आये तो घर की याद आई है,
तुम आये तो मुझे मेरे घर की याद आई है
‘दूर रहके ये जाना जुदाई चीज़ है क्या,
एक एक पल लगता साल मुझे, वक़्त काटे नहीं कटता था’
अपनों से अपना यार गया, दिल से तो कोई दिलदार गया,
रोई सबकी आँखें जब इस पार से मै उस पार गया,
एक दर्द था दिल में ऐसा, क्या बयाँ करू था कैसा,
मेरे वतन की मिटटी ने, फिर यादें वो महकायी है
तुम आये तो घर की याद आई है,
तुम आये तो मुझे मेरे घर की याद आई है
‘उन्हें कैसे भुला दूँ मै कि जिनका खून है मुझमे,
जुदा रहना बड़ा मुश्किल इसे समझाऊँ भी कैसे’
उस वक़्त पता न कुछ मुझको, एहसास भी कैसा होता था,
जब याद सभी की आती थी, मै छुप छुप कर के रोता था,
बस बुझा बुझा रहता मन, थम सी गयी थी धड़कन,
लगता है जैसे आज मुझे खुशियों की घड़ियाँ आई है
तुम आये तो घर की याद आई है,
तुम आये तो मुझे मेरे घर की याद आई है
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