Poem

Dry Loaf & Pickle

Written by Gaurav

माँ तेरी आँखों का वत्सल, प्यार भूल न पाया हूँ,
सूखी रोटी, अचार तेरा वो स्वाद भूल ना पाया हूँ।

वो दिन दोपहरी का था जब मै काम से बाहर निकला था।
था पेट भूख से उबल रहा, न जेब में कोई रुपया था।

एक दूर झोपडी के बाहर, कोई बुढ़िया गुमसुम बैठी थी।
बूढ़ी आँखे उसकी हरपल तपते रस्ते को तकती थी।

था कंठ प्यास से सूख रहा, फिर भी कुछ हिम्मत कर बोला,
माँ, मुझे बहुत है भूख लगी, घर में कुछ खाने को होगा?

यूँ देख के मेरी हालत को वो बोली रुक मैं आती हूँ।
फिर बोली बेटा पानी पी, मैं कुछ खाने को लाती हूँ।

बाहर आकर बोली बेटा, बस रोटी और अचार बचा।
नहीं पता मुझको क्या तुमने पहले कभी ये स्वाद चखा।

मै बोला माँ जो है ला दे, चाहे वो रूखा सूखा हो,
वो क्या स्वाद को परखेगा, जो बड़ी देर से भूखा हो।

इतना कहकर उस खाने को हाथों में लेकर बैठा मै,
सच मे ऐसा फिर स्वाद कभी न चखा दुबारा जीवन में।

एक एक निवाला खाने का मै कभी भूल न पाया हूँ।
यूँ लगा जनम कोई नया मिला, मै फिर धरती पर आया हूँ।

कितना घूमा बाहर मैं और कितना बाहर खाया हूँ।
पर….सूखी रोटी, अचार तेरा वो स्वाद भूल ना पाया हूँ।

माँ तेरी आँखों का वत्सल, प्यार भूल न पाया हूँ।
सूखी रोटी, अचार तेरा वो स्वाद भूल ना पाया हूँ।

Photo by Usman Yousaf from Pexels

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About the author

Gaurav

मै और मेरी कलम अक्सर ये बातें करतें, तुम अच्छा सोचते तो ऐसा लिखती, तुम और भी अच्छा सोचते तो मै वैसा लिखती. तुम इस बात को ऐसे कहते, तुम उस बात को वैसे कहते.... मै और मेरी कलम अक्सर ये बातें करतें....

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