धूप की परछाईयो में मेरी भी परछाई है,
कब बनी कब मिट गयी मुझको कुछ भी पता नहीं है
सुबह का निकला, घर से अकेला, मजिल का कुछ नहीं ठिकाना,
आज यहाँ है, कल ना जाने, होगी कहाँ ये, कोई ना जाना
मुश्किल डगर है, लम्बा सफ़र है, रुकने का सोचा नहीं,
चलना संभलकर, गिरने का है डर, लेकिन फिर भी चलना अभी
बारिश की एक बूँद है जीवन, सागर से कब जा मिली है,
कब बनी कब मिट गयी मुझको कुछ भी पता नहीं है
सुख: दुःख: जीवन के दो पहलू, आते है और जाते हैं,
सुख हमको खुशियाँ देता, ग़म आके हमें रुलाते है
दुःख लगता एक कठिन घड़ी, सुख कब बीता कुछ पता नहीं,
जो दुःख हंसकर झेल ले सारे, उससे बढ़कर कोई नहीं
जो है समझता इन बातों को उनके लिए कुछ नया नहीं है,
कब बनी कब मिट गयी मुझको कुछ भी पता नहीं है
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